01.01.2026

नमस्कार

ईस्वी सन 2025 की विदाई और 2026 का पदार्पण हो चूका है. नूतन केलेंडर वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ. परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि आगामी केलेंडर वर्ष में भी हम सभी साहित्यिक

कविता - पहली फूँक - सत्यवती मौर्य

 

 

पहली फूँक किसने मारी होगी 

धुएं से भरे चूल्हे की आग जलाने के लिए कभी

 

या आग से जली त्वचा पर मारी होगी

'गुनाहों का देवता' और 'रेत की मछली' - एक तफ्तीश – हरगोविन्द विश्वकर्मा

'गुनाहों का देवता' का आदर्शवादी चंदर असल में 'रेत की मछली' में अपराधी शोभन है...

दोहे - रवि यादव ’रवि‘

 


दो नैनों ने मान ली, दो नैनों की बात

दो जोड़ी नैना जगें, सारी सारी रात

 

कच्ची मिट्टी ले रही, अगर ग़लत आकार

मिट्टी नहीं कुम्हार है, इसका ज़िम्मेदार

अशोक 'अंजुम' के सर्दी के दोहे


सेंध लगाकर धँस रही, हर सू सर्द बयार
मैं कहता हूँ ‘रपट लिख’, काँपे थानेदार
 
झबरा थर-थर काँपता, हलकू है मायूस
मौसम की दहलीज पर, खड़ा हुआ है पूस

दोहे - विजेन्द्र शर्मा

 

इक रिश्ता बेनाम सा , चला थाम के हाथ !
इक रिश्ता घुटता रहा , लेकर फेरे साथ !!
 
 
भारी पत्थर इश्क़ है , कहते थे ये "मीर" !
चलो उठा के देख लें , आगे जो तक़दीर !!

कुण्डलिया छन्द - गाफिल स्वामी

 

 

चाहे  संत   सुजान  या, सूर, शेठ, शैतान ।

निज कर्मों का भोगते, भोग  सभी इंसान ।।

लघुकथा - धूप के रंग - योगराज प्रभाकर

वह अंधा था। जन्म से। पर उसे धूप से मोह था।

हर सुबह छत पर बैठता। चेहरे को आकाश की ओर उठाता।

लघुकथा – पासा - सतीश दुबे

खाना लगा दूँ?”
हूँ...
मूड तो अच्छा है?”
हाँ...
स्मिता आजकल ज़िद नहीं करती।
हूँ...

लघुकथा - दीपक बनो - डॉ. पूजा हेमकुमार अलापुरिया 'हेमाक्ष'

मंथन अपने दादा जी के साथ शाम की सैर करने निकला और कुछ दूर चलने पर दादा जी को उनका भतीजा पंकज मिला। पंकज ने ताऊजी को देखकर अनदेखा करने का प्रयास किया, मगर ताऊजी ने पंकज को आवाज दी और कुशल क्षेम पूछा और आशीर्वाद देते हुए दीपक बनने की सलाह देते हुए आगे बढ़ गए।  

नवगीत - क़दों को नापने बौने खड़े हैं - सीमा अग्रवाल


 

क़दों को नापने

बौने खड़े हैं

 

सभी की गर्दनें

कस कर तनी हैं

नवगीत - मैं क्या आज लिखूँ – रवि खण्डेलवाल

 

 

लिखने बैठा समझ न आया

मैं क्या आज लिखूँ

पाँवों के मैं घाव लिखूँ  ?

आँखों के ख़्वाब लिखूँ ?

बालगीत - मेरे प्यारे मामा जी - आशा पाण्डेय ओझा 'आशा'

 


मेरे  प्यारे  मामा जी ।

खेला करते ड्रामा जी ।।

 

रावण बनते कभी-कभी ,

बनते कभी सुदामा जी ।

अवधी लोकगीत – दुअरे पर आइल बारात – कुसुम तिवारी ‘झल्ली’

 
दुअरे पर आइल बारात
हे बबुनी हमार बबुनी
झलक तनी पहुना क देखी ल

ब्रजभाषा के तुक्तक - भाड़ में जान्दै, हमै का परी – रेणु शर्मा

 

 

ढिकाने कौ छोरा, फलाने की छोरी,

छत पै रोज मिलें चुपके-चुपके, चोरी-चोरी

पढ़ाई-लिखाई तौ उनके बस बहाने एं ,

उन्नैं तौ दुछत्ती पै जाकैं नैना लड़ाने ऐं

मैथिली कविता - तीलक तार – अम्बिका झा

 


"हे यौ भइया आँहाँ कोना दुबरा गेल छि ?
बहिन हाथक भोजन बिन कुम्हला गेल छि।
 
हे यौ कि कहलौं ?

मुक्तक - अश्विनी उम्मीद लखनवी


जबसे देखा हाल बेचारी बिरहन का
रो रोकर के हाल बुरा है दरपन का
अब तक इतनी बार कलाई पकड़ी है

संस्कृत गजल - हृद्यमादौ च वेदनामन्ते - डा० लक्ष्मी नारायण पाण्डेय

 

 

हृद्यमादौ च वेदनामन्ते

मादृशा ब्रूहि के समीहन्ते

 

इन्द्रजालं प्रवर्तते मित्र 

सर्षपा यत्करे विजायन्ते 

ब्रजगजल - कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में – कृष्ण कुमार ‘कनक’

 

 
कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में
दीखै सिग संसार तिहारी अँखिय’न में
 
लट की लटकन कहै प्रेम कौ परस करौ
अन गाए कौ प्यार तिहारी अँखिय’न में

हिन्दी गजल - मैं मरुथल, वो सावन होता – पुष्पेन्द्र ‘पुष्प’

 

 
मैं  मरुथल, वो  सावन होता
ये  अनुपम   संयोजन  होता
 
उर   में  भाव  उमड़ते  रहते
आँखों   से  अनुमोदन होता

हिन्दीगजल - सबके झगड़ों को सुलझाना, छोड़ चुका हूँ - अटल राम चतुर्वेदी

 

 
सबके झगड़ों को सुलझाना, छोड़ चुका हूँ
बात-बात में टाँग अड़ाना, छोड़ चुका हूँ
 
समझ गया हूँ अधिक बोलना, है दुखदाई
सबको मन की बात सुनाना, छोड़ चुका हूँ

भोजपुरी गजल - बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल - मनोज भावुक

 

 
बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल
 
खुशबू भरल सनेह के उपवन कहाँ गइल
भउजी हो, तहरा गाँव के मधुवन कहाँ गइल

ગુજરાતી ગઝલ - વારતા છે એટલી, આગળ નથી – અંજના ભાવસાર ‘અંજુ’

 

વારતા છે એટલીઆગળ નથી
'છે પ્રતીક્ષા આંખમાંકાજળ નથી!'
 
 કાયમી વસવાટ માટે આવજે,
હૈયું મારું પર્યટનનું સ્થળ નથી.

ગુજરાતી ગઝલ - પ્રેમ રોપીને હ્રદયમાં મોકલ્યા'તાં ઈશ્વરે – દેવાંગ પારીખ

 

 
પ્રેમ રોપીને હ્રદયમાં મોકલ્યા'તાં ઈશ્વરે
આપણે નફરત શીખ્યાં, તો પ્રેમ મૂક્યો છાપરે
 
માનવી વંશજ અમારા, જો કહીએ કોઈને
આવતી અમને શરમ, એવું કહ્યું એક વાનરે

ગુજરાતી ગઝલ - શેનું છાંટીને નીકળે છે અત્તર જેવું – દિલીપ રાવલ

 


શેનું છાંટીને નીકળે છે અત્તર જેવું

આઈ થિન્ક એને બેઠું છે સત્તર જેવું

 

કેમ કરીને વાત અમારી ત્યાં લગ પહોંચે ,

એણે પહેરી લીધું છે કંઇ બખ્તર જેવું

मराठी ग़ज़ल - भाग्यात जे न लिहिले ते लाभणार नाही - देवदत्त संगेप

 

 

भाग्यात जे न लिहिले ते लाभणार नाही

मानावयास पण  हे कोणी तयार नाही

 

उध्वस्त वावरांचे पाहून हाल सारे

हतबल कृषीवलाच्या दुःखास पार नाही

राजस्थानी गजल – हुयो म्हैं बावळो ; था'रै ई जादू रौ असर लागै – राजेन्द्र स्वर्णकार

 

 
हुयो म्हैं बावळो ; था'रै ई जादू रौ असर लागै !
कुवां में भांग रळगी ज्यूं, नशै में स्सौ शहर लागै !
 
छपी छिब थारली लाधै, जिको ई काळजो शोधूं,
बसै किण-किण रै घट में तूं, भगत था'रा ज़बर लागै !

ग़ज़ल - सुख की बाँहों में कभी प्यार से घेरे जाएँ - के पी अनमोल

 

 
सुख की बाँहों में कभी प्यार से घेरे जाएँ
और हम दुःख की तरफ आँख तरेरे जाएँ
 
जिस तरफ रहती है हर वक़्त दीवारों पे नमी
बस उसी ओर नयन धूप के फेरे जाएँ

ग़ज़ल - जवाँ अब हो गया बेटा वो ऊँचा बोल सकता है – असलम हसन

 

 
जवाँ अब हो गया बेटा वो ऊँचा बोल सकता है
यही है मसलहत वरना ये बूढ़ा बोल सकता है
 
मेरी नानी के मरते ही ज़ुबाँ ख़ामोश है इसकी
न मैना बोल सकती है, न तोता बोल सकता है 

ग़ज़ल – हाल अपना बता नहीं सकते – अफ़सर दकनी

 


हाल अपना बता नहीं सकते

दिल का दुखड़ा सुना नहीं सकते

 

बातों-बातों में रूठ जाते हो

अब के तुमको मना नहीं सकते

व्यंग्य - कंजूसों का बादशाह - डॉ. प्रमोद सागर

कहते हैं कि हर मुल्क, हर क़ौम और हर मोहल्ले में, कमोबेश एक न एक बादशाह ज़रूर पैदा होता है—कहीं शायरी का, कहीं सियासत का, कहीं जुर्म का। मगर हमारे दौर का जो बादशाह है, वह न ताज पहनता है, न सिंहासन पर बैठता है; वह बैठता है अपनी तिजोरी पर, और ताज की जगह

और भी शानदार रही नस्ल-ऐ-नौ भारत मुशायरे की तीसरी कड़ी – उमेश कुमार शर्मा

किस किस को मैं बयान करूं और किसको छोड दूं ,
उस महफिल में हर एक शायर था कोहिनूर की मानिंद।
 
जी हां दोस्तों मेरा यह शेर उन सभी 12 कोहिनूर शायरों पर खरा उतरता है जिनसे भाई नवीन जोशी जी ने नस्ल-ऐ-नौ भारत की तीसरी महफिल रोशन की थी।

शताब्दी वर्ष पर मोहन राकेश को याद किया ‘बतरस’ ने - डॉ मधुबाला शुक्ल

मुंबई के ‘केशव गोरे ट्रस्ट’ सभागार में शहर की सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ के दूसरे दौर का २७वां मासिक आयोजन सम्पन्न हुआ। प्रमुख वक्तव्य देते हुए डॉ. दयानंद तिवारी ने मोहन राकेश को

भारतीयता के मूल तत्व से ओत-प्रोत व्यक्तित्व यानि रमेश कँवल

 25 अगस्त, 1953 को जितौरा, पियरो, आरा, बिहार में जन्मे आदरणीय रमेश कँवल जी भी उन चुनिन्दा लोगों में शामिल हैं जिनकी कि ऊर्जा कोविड के बाद कई गुना बढ़ गयी. सामान्यतः

"ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार" का लोकार्पण कार्यक्रम

 

ईसवी सन 2025 का अन्त बड़ा ही सुखद रहा. “ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार” नामक साझा संग्रह का विमोचन अन्यान्य कारणों से टलता जा रहा था और अचानक ही फिर