नमस्कार
साहित्यम्
हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
01.01.2026
दोहे - रवि यादव ’रवि‘
दो नैनों ने मान ली, दो
नैनों की बात
दो जोड़ी नैना जगें, सारी
सारी रात
कच्ची मिट्टी ले रही, अगर
ग़लत आकार
मिट्टी नहीं कुम्हार है, इसका ज़िम्मेदार
अशोक 'अंजुम' के सर्दी के दोहे
मैं कहता हूँ ‘रपट लिख’, काँपे थानेदार
मौसम की दहलीज पर, खड़ा हुआ है पूस
दोहे - विजेन्द्र शर्मा
इक रिश्ता घुटता रहा , लेकर फेरे साथ !!
भारी पत्थर इश्क़ है , कहते थे ये "मीर" !
चलो उठा के देख लें , आगे जो तक़दीर !!
लघुकथा - दीपक बनो - डॉ. पूजा हेमकुमार अलापुरिया 'हेमाक्ष'
मंथन अपने दादा जी के साथ शाम की सैर करने निकला और कुछ दूर चलने पर दादा जी को उनका भतीजा पंकज मिला। पंकज ने ताऊजी को देखकर अनदेखा करने का प्रयास किया, मगर ताऊजी ने पंकज को आवाज दी और कुशल क्षेम पूछा और आशीर्वाद देते हुए दीपक बनने की सलाह देते हुए आगे बढ़ गए।
ब्रजभाषा के तुक्तक - भाड़ में जान्दै, हमै का परी – रेणु शर्मा
ढिकाने कौ छोरा, फलाने
की छोरी,
छत पै रोज मिलें चुपके-चुपके, चोरी-चोरी
पढ़ाई-लिखाई तौ उनके बस
बहाने एं ,
उन्नैं तौ दुछत्ती पै जाकैं नैना लड़ाने ऐं
ब्रजगजल - कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में – कृष्ण कुमार ‘कनक’
कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में
दीखै सिग संसार तिहारी अँखिय’न में
अन गाए कौ प्यार तिहारी अँखिय’न में
हिन्दीगजल - सबके झगड़ों को सुलझाना, छोड़ चुका हूँ - अटल राम चतुर्वेदी
बात-बात में टाँग अड़ाना, छोड़ चुका हूँ
सबको मन की बात सुनाना, छोड़ चुका हूँ
भोजपुरी गजल - बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल - मनोज भावुक
माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल
भउजी हो, तहरा गाँव के मधुवन कहाँ गइल
ગુજરાતી ગઝલ - વારતા છે એટલી, આગળ નથી – અંજના ભાવસાર ‘અંજુ’
'છે પ્રતીક્ષા આંખમાં, કાજળ નથી!'
કાયમી વસવાટ માટે આવજે,
હૈયું મારું પર્યટનનું સ્થળ નથી.
ગુજરાતી ગઝલ - પ્રેમ રોપીને હ્રદયમાં મોકલ્યા'તાં ઈશ્વરે – દેવાંગ પારીખ
આપણે નફરત શીખ્યાં, તો પ્રેમ મૂક્યો છાપરે
આવતી અમને શરમ, એવું કહ્યું એક વાનરે
ગુજરાતી ગઝલ - શેનું છાંટીને નીકળે છે અત્તર જેવું – દિલીપ રાવલ
શેનું છાંટીને નીકળે છે અત્તર જેવું
આઈ થિન્ક એને બેઠું છે સત્તર જેવું
કેમ કરીને વાત અમારી ત્યાં લગ પહોંચે ,
એણે પહેરી લીધું છે કંઇ બખ્તર જેવું
मराठी ग़ज़ल - भाग्यात जे न लिहिले ते लाभणार नाही - देवदत्त संगेप
भाग्यात जे न लिहिले ते
लाभणार नाही
मानावयास पण हे कोणी तयार नाही
उध्वस्त वावरांचे पाहून हाल
सारे
हतबल कृषीवलाच्या दुःखास पार नाही
राजस्थानी गजल – हुयो म्हैं बावळो ; था'रै ई जादू रौ असर लागै – राजेन्द्र स्वर्णकार
कुवां में भांग रळगी ज्यूं, नशै में स्सौ शहर लागै !
ग़ज़ल - सुख की बाँहों में कभी प्यार से घेरे जाएँ - के पी अनमोल
और हम दुःख की तरफ आँख तरेरे जाएँ
बस उसी ओर नयन धूप के फेरे जाएँ
ग़ज़ल - जवाँ अब हो गया बेटा वो ऊँचा बोल सकता है – असलम हसन
यही है मसलहत वरना ये बूढ़ा बोल सकता है
न मैना बोल सकती है, न तोता बोल सकता है
ग़ज़ल – हाल अपना बता नहीं सकते – अफ़सर दकनी
हाल अपना बता नहीं सकते
दिल का दुखड़ा सुना नहीं
सकते
बातों-बातों में रूठ जाते हो
अब के तुमको मना नहीं सकते
व्यंग्य - कंजूसों का बादशाह - डॉ. प्रमोद सागर
और भी शानदार रही नस्ल-ऐ-नौ भारत मुशायरे की तीसरी कड़ी – उमेश कुमार शर्मा
जी हां दोस्तों मेरा यह शेर उन सभी 12 कोहिनूर शायरों पर खरा उतरता है जिनसे भाई नवीन जोशी जी ने नस्ल-ऐ-नौ भारत की तीसरी महफिल रोशन की थी।
शताब्दी वर्ष पर मोहन राकेश को याद किया ‘बतरस’ ने - डॉ मधुबाला शुक्ल
भारतीयता के मूल तत्व से ओत-प्रोत व्यक्तित्व यानि रमेश कँवल
"ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार" का लोकार्पण कार्यक्रम
ईसवी सन 2025 का अन्त बड़ा ही सुखद रहा. “ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार” नामक साझा संग्रह का विमोचन अन्यान्य कारणों से टलता जा रहा था और अचानक ही फिर
































